anubhav
उस दर्द का अब बयां नहीं उन हसरतों का भी निशान नहीं जो साथ उसके जुड़े थे वक़्त कैसा भी हो हम हर पल में उड़े थे समुंदर की तन्हाइयों में तू नजर आती है रात की अंगड़ाईयों में तू ही नजर आती है तू आती है मिलने तो बात करके नहीं जाती है पुकार ता हूं तुझे गर तू आती है पर मुस्कुरा कर लौट जाती है कोई खास वजह इस अंदाज़ की गुज़ारिश है कद्र कर ले मेरे जज़्बात की ...