anubhav

उस दर्द का अब बयां नहीं
 उन हसरतों का भी निशान नहीं 
जो साथ उसके जुड़े थे 
वक़्त कैसा भी हो
 हम हर पल में उड़े थे
                                                                                           
समुंदर की तन्हाइयों में तू नजर आती है
 रात की अंगड़ाईयों में तू ही नजर आती है 
तू आती है मिलने तो 
बात करके नहीं जाती है
 पुकार ता हूं तुझे गर
 तू आती है पर मुस्कुरा कर लौट जाती है
 कोई खास वजह इस अंदाज़ की 
गुज़ारिश है
 कद्र कर ले मेरे जज़्बात की
                                                                                   
महफिलों से दूर दूर तक अब हमारा कोई नाता नहीं हजारों की भीड़ में जहां दिल को कोई भाता नहीं रूह जो हमें पुकारती है बार बार आंखों में बसा है जिसका दीदार वो इन महफिलों में रहते नहीं जो साथ हमारे बैठे है हम कैसे बताएं हम उनके साथ बैठे नहीं

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