anubhav Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps July 05, 2020 ज़िन्दगी के हर अनुभव को मैं कलम से सजाती हूं जो अच्छा लगता है संग उसके बेह जाती हूं मैं खुद से मिलने की ख्वाहिश में कभी इस डाल तो कभी उस डाल उड़ती जाती हूं उड़ जाऊं जितना भी लौट कर फिर घर ही आती हूं पूजनीय केवल प्रेम जो करे वो खाए कंकर औषधि केवल संतुष्टा जो अपना ले स्वॅम खुदा उसके अंदर इस वक़्त को हम संभाल रहे हैं या हमें ये वक़्त कुछ समझ नहीं आ रहा दोनों ही सूरतों में हालात हैं बहुत सक्त Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Comments
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