कमाल है ना दोस्ती का भी मिले दो दोस्त पचास साल बाद खिल उठा बच्चपन पुरानी यादों के साथ लाजवाब था हर लम्हा जो बिताया था आंखों ही आंखों में जिसे देख सजाया था उन पलों को याद कर कुछ हम ज़िंदा हुए कुछ सपने फिर बोए हर छोटी छोटी बात मुस्कुराहट ले आती है जाने उन बातों से कैसी तरावट छा जाती है की हम आज को भूल बचपन से मिल गए किसी को हमारे होने का आज भी इंतजार है ये सोच कर हम खिल गए स्वम से रूबरू होने की ख्वाहिश थी इस चाहत ने दरबदर ठोकरें खिलाई थी बहुत सी खुवाहिशो से मिला पर उस तत्व से कहीं ना कहीं जुदाई थी ... जिसमें सुकून के इलावा.... सब चीज़ की कमाई थी... मैं हार कर जब घर लौटा .... उस सुकून ने मेरे स्वागत में बाहें फैलाई थी मेरी मां मैं जहां घूम आया पर जन्नत तेरे प्यार ने ही दिखाई थी...