अब समझ में आने लगा है कि हम जो चाहे करले.. जो चाहें सोच ले.. होगा वही जिसमे उसकी मर्जी है.. पर एक बात पक्की है जो मंजिल की चाहत में ज़मी आसमां एक कर दे.. वो उसकी अवश्य सुनता अर्जी है...
इधर से उधर भागंभाग में खुद को टोपी पहनना छोड़ दो अब तो अपना समझो यारों वक्त को आज़माना छोड़ दो ये दुनिया अदभुद है मान गए ना फिर भी एक वायरस ने दुर्बल बना दीया जान गए ना
उम्मीद का जिक्र किया तो को सुकून मिला हिम्मत ऐसी बंधी मानो जैसे मंजिल पर पहुंच ही गया.. इसलिए प्रार्थना कि जिए वक्त जैसा भी है हमारा ही है हिम्मत से काम लो यारो पल पल निकलता जाएगा कोरोना से हमें मुक्ति भी ये वक्त ही दिलवाएगा