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khud aa kar to zindagi bhi piyaar nahi karti

आशिकी बढ़ती गई

आशिकी बढ़ती गई जैसे जैसे हमारी शायरी से दागा देने वाले दोस्त कम हो गए जो दिल से नही, दिखावे के लिए जुड़े थे वो दूर हो गए........... और जो मन से चाहते थे पर कह नही पाते थे वो बहुत खूब - बहुत खूब कह करीब हो गए..........................

झुकना मुनसिफ़ समझा हमने

झुकना मुनसिफ़ समझा हमने क्योंकि रिश्तों का पल्ला भारी निकाला, हमने सोचा हम एकेले जी लेंगें पर इस सोच में घर हमारा खाली निकला, सही और ग़लत की परिभाषा हम जानते नही पर उनके बिना जीना मुश्किल निकला, अब चाहे वो हमें कुछ भी समझे हमने जब साथ निभाने की फिरसे ठानी......... तो हमारा मन भी हमारे साथ ही निकला....................

शहीदी दिवस के अवसर पर शहीदों के मन की बात कहना चाहूँगी .........

शहीदी दिवस के अवसर पर शहीदों के मन की बात कहना चाहूँगी ......... सरहदों से इश्क कर बैठे हैं इसलिए हम वही पर रहते हैं, ऐसा नही की हमारे परिवार में हमारा मन नही पर मक्खी भी किसी गैर मुल्क की सिर उठा कर सरहद को देखे वो हमे पसंद नही, बात जब मात्रभूमि की हो तो हमे किसी पर विश्वास नही इसकी खुशहाली बनाए रखने के सिवा हमारा कोई खुवाब नही, बल्कि अब खुवाहिश है कि मर कर भी रूह को रखें ज़िंदा ताकि थर थर कांपे हर वो परिंदा, मज़बूर करदें हर आतंक को सोचने पर की आख़िर लड़ना किससे है यहाँ तो सरहदें ओटें सेना ज़मीं पर है तो फ़िज़ाओं से लिपटी रूह में सेना ...............आसमाँ में ऐसी देश भक्ति ना देखी किसी जहाँ में सलाम कर रुख़ मोड़ लें भारत को जीतने का खुवाब छोड़ दें............... जय भारत

मिसाल बनाओ

वक़्त ने एक बार फिर

वक़्त ने एक बार फिर तुम्हें मेरी मंज़िल का किनारा बनाया है अब तो मुझे क़ुबूल कर लेना पहले तो तुमने मुझे ठुकराया है, मैने शिकायत तो तभ भी ना की थी मान लिया था मेरी महोब्बत में कमी थी, पर अब वफ़ा का पल्ला मेरा भारी है अंजाम अब भी जो हो याद रखना सनम.................... ये दीवानी हमेशा तुम्हारी थी..........तुम्हारी है........

बेवजह की नाराज़गियों से दिल कुछ इस कदर टूटा है

बेवजह की नाराज़गियों से दिल कुछ इस कदर टूटा है लगता है अब हर रिश्ता जूठा है, वो सब जो प्रेम ने बोया था जाने किस आग में झोंका है फिरसे हाथ बढ़ाने का इस बार मन नही होता है, पर कैसे जिएंगे ये सोच - सोच कर वही मन रोता है आज लगता है आदमी एहम के आगे वाकई छोटा है, मन का समुंदर  क्यों फूट फूट कर रोता है उँची छलाँग मार  मेरे अतीत को भिगोता है, हरा हुआ दिल फिर कहता है छोड़ माना ले तेरा रिश्ता छोटा है कदम कहते हैं नही अब नही ज़मीर भी कुछ होता है, ......................... आख़िर आदमी एहम में आकर रिश्ते क्यों खोता है.................