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जिसे मैं ढूँढती रही

जिसे मैं ढूँढती रही दर बदर वो मुझे मिला मेरे ही घर, परख में फरख का फासला जिस दिन ख़त्म किया, जो मिला है .......... उसे अपना कर जीना शुरू किया..........

एक सवाल

एक सवाल आज नही तो कल मन में आ ही जाता है आख़िर लड़की होना गुनाह क्यों बन जाता है................

मन क्यूँ रुआंसा है

मन क्यूँ रुआंसा है हर ओर लगता धुआंसा है फूल खिल रहें हैं पर मेरा दम घुट रहा है हर ओर उजाला है पर मेरे मन का दीपक बुझ रहा हैं चिड़िया चहक ती है तो लगता है मुझ पर हस्ती है मेरे मन सुकून जाने क्या मुझसे कह रहा है........ खुद को ही आज पढ़ नही पा रही हूँ जिस रह पर नही चलना चाहती उस पर चलती जा रही हूँ..............

खुवाहिश रखतें हैं

मुक्कम्मल जहाँ की खुवाहिश रखतें हैं   हम सोचते हैं की हम बहुत सस्ते हैं . . . . . . . . . . . .  

मैं फिर भी ज़िंदा हूँ

मैं फिर भी ज़िंदा हूँ मौत से मिलकर किसी को मार देना , फिर भी आसान है जीते   जी किसी के ज़मीर को मार कर , उसे ज़िंदा रहने पर मजबूर कर देना क्या कहूँ ....... मैं......क्या कहूँ वो एक लाश है हर जगह है शमशान जिस्म तो ज़िंदा है पर मर गया भीतर बैठा इंसान , देखती है वो हर ओर नज़र आता है अंधेरा उसके जीवन में वो रात रह जाती है जिसका नही हो पाता कोई सवेरा , जीती है फिर भी वो क्योंकि साँसों का हिसाब पूरा हुआ नही मर कर उसने इंसाफ़ पाया तो क्या जो ज़िंदा रह कर , जीया ही नही................ मैं फिर भी ज़िंदा हूँ धन्यवाद

ठहर जा बच्पन

ठहर जा बच्पन https://www.youtube.com/watch?v=OWdnw2E9fTo

खुश नसीब समझती हूँ खुद को जो इतने दोस्त मिलें

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