हमारे कर्मों का ही सारा घपला था....



नसीब से खिले थे हम ..
नसीब में थे कुछ गम,..
नसीब में थे सुख नसीब में था कुछ कम....
सिर्फ़ देखने का नजरिया बदला था...
हमारे कर्मों का ही सारा घपला था....

शिकायत अपनों की
किससे और कैसे करू..

ये कुछ वो अपने है जो...
या तो खून के रिश्तों से लिपटे है...
या कुछ दिल के रिश्तों में सिमटे हैं...





 

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