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बरसते थे सावन कभी मोर भी इतराता था

एक वक़्त था जब भारत का गीत हर कोई गुनगुनाता था आज चलते हैं अपने ही देश में मुसाफिर बन कर भूल कर वो प्रेम जब हर कोई मिट्टी से तिलक लगाता था

आखिर ऐसा क्या बोला वक़्त या इंसान लगाया जा सकता है अनुमान

sonalinirmit






 

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