MERA ANUBHAV

तुम मेरे साथ हो कृष्णा
कुछ ख्वाब अभी भी हैं अधूरे
कुछ हो गए पूरे
साथ था कभी अपनों का
कभी था सपनों का
कभी गिरे तो कभी उभरे
हाथ थामे बैठा है वो
शायद इसलिए परिस्थिति कैसी भी
अभी तक नहीं गुज़रे


खुश भी हूं
खफा भी हूं
खुद से कभी कभी जुदा भी हूं
मैं खामोशी भी हू सज़ा भी हूं
मैं मुस्कुराती हुई शाम की
महकती हुई हवा भी हूं
मैं क्या हूं
मैं सुएम् भी उस सवाल से अभी तक घिरा नहीं
हां में वो ज़रूर हूं जिसका कोई सिरा नहीं
मैं वो अंगूठी हूं
जो अंगुली में तो है पर उसमें कोई हीरा नहीं
मैं भुजे दीपक का धुआं हूं
मोहब्बत से भरा कुआं हूं
आज़माना मत मैं कोई खिलौना नहीं हूं
मन मरजी से बिछने वाला कोई बिछौना नहीं हूं
                                                                     
कश्ती सच्ची मोहब्बत की
अक्सर किनारे नहीं लग पाती
वो निकल जाती है।
पर उनकी यादें नहीं जाती
हम उन्हें समझ नहीं आते
पर हमें सिर्फ वो ही समझ आती
ठुकराए जाने के बाद भी
हमें सिवा उनके कोई और नहीं भाती
वो चाहे कितनी भी दूर निकल जाए
रूह उन्हें ही आवाज़ लगाती
दिल की तरंगे भी उन्हीं को गुनगुनाती
                                                                                             

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