Ehsaas
स्वीकार नहीं कर पा
रही जो भूलना बहुत जरूरी हो गया है।
वो भूल नहीं पा रही

रही जो भूलना बहुत जरूरी हो गया है।
वो भूल नहीं पा रही
हिसाब तो लगता है
ज़िन्दगी में किसी भी चीज का
कभी हुआ ही नहीं है
कहीं जरूरत से ज़्यादा है
तो कहीं जरूरत का भी नहीं है।
परवाह करनी छोड़ ही दो तुम हमारी
जब जब तुम हमारा हाथ थाम कर
हमें किनारा दिखाते है
उसके साथ दलीलों को गिनवाते हो
तुम हमारा वजूद गिराते हो
हमें हमारे हाल पर ही छोड़ दो
तुम्हारे दिखाएं किनारों पर हमें
सुकून नहीं मिलता हमें मझधार में ही छोड़ दो

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