हाँ बस लड़ रहा है
आज के दौर में गौर फरमाओ तो
आदमी बस लड़ रहा है
कोई खुवाँबों से
कोई शरीर से
कोई हालात से
तो कोई जज़्बात से
कोई मजहबों से
कोई फुटपाथ से
कोई अपनों से
तो कोई समाज से
बस लड़ रहा इस कायनात से
बस अब थक गया मैं
ग़लतियाँ समझ गया मैं
माफ़ कर दे ए खुदा
अब ना करूँगा कोई ख़ाता
फिर चाहे
सबका करूँगा सम्मान
प्रकृति हो या जानवर या हो इंसान
मैं अब सिर्फ विवेक के रास्ते पर चलना चाहता हूं
बहुत ठोकर कहा चुका हुं
बस अब और नहीं इस बनावटी दुनिया के
बिछाए जाल में खुद को छलना चाहता हूं
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