फिर किससे ये एहसास हैं तकरारे........


एहसासों के मोतीओं को पिरों नही पाते
नज़रें मिला कर तुमसे बुझे बुझे हो जाते,
इशारे करते जब तुम
हम खुद को गुम सुम से पाते,
अनकहे शब्दो के भंवर में
खुद खुद फँस जाते
सपने देखते नही तुम्हारे
जाने फिर क्यों गिनते हैं तारे
दूर दूर तक थमा सन्नाटा
फिर क्यों लगता की कोई है जो हमको है पुकारे,
और जब दिखाई भी नही देता कोई
फिर किससे ये एहसास हैं तकरारे........
            

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