मन की सुन गाता रहा अपनी धुन, ज़माने के लिए बुरा पर मैं था मगन, वक़्त से यही सीखा मैने अब क्या ज़रूरी था दूसरों को खुश करना अब ना मंज़ूरी था..........
मन की सुन
गाता रहा अपनी धुन,
ज़माने के लिए बुरा
पर मैं था मगन,
वक़्त से यही सीखा मैने
अब क्या ज़रूरी था
दूसरों को खुश करना
अब ना मंज़ूरी था..........
गाता रहा अपनी धुन,
ज़माने के लिए बुरा
पर मैं था मगन,
वक़्त से यही सीखा मैने
अब क्या ज़रूरी था
दूसरों को खुश करना
अब ना मंज़ूरी था..........
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