तुम्हें कहती हो...कोई हक़ नही है मैं फिर भी माँग लेता हूँ कोई अपनापन है जो मैं ठुकराए जाने पर भी तुम्हें थाम लेता हूँ,
तुम्हें कहती हो...कोई हक़ नही है
मैं फिर भी माँग लेता हूँ
कोई अपनापन है
जो मैं ठुकराए जाने पर भी
तुम्हें थाम लेता हूँ,
रोज़ रात भीगी पॅल्को के
तुम्हीं आँसू पोंछती हो
कैसे यकीं दिलवाओं अंधकार में खो जाने से
तुम्हीं रोकती हो,
रूह एक हो चुकी है हमारी
तुम फिर भी महोब्बत को नफ़रत की आग में जलाती हो
जिस झूटे ज़माने की तुम्हे परवाह है
तुम उसके डर से सच्ची महोब्बत को स्वीकारने से घबराती हो.....
पर तुम भी याद रखना
जिस रूह के हम साथी हैं
उसमे तुम्हारा अक्स खुद समाएगा
तुम्हे अपना बनाए बिना
ये आशिक कहीं नही जाएगा.............
मैं फिर भी माँग लेता हूँ
कोई अपनापन है
जो मैं ठुकराए जाने पर भी
तुम्हें थाम लेता हूँ,
रोज़ रात भीगी पॅल्को के
तुम्हीं आँसू पोंछती हो
कैसे यकीं दिलवाओं अंधकार में खो जाने से
तुम्हीं रोकती हो,
रूह एक हो चुकी है हमारी
तुम फिर भी महोब्बत को नफ़रत की आग में जलाती हो
जिस झूटे ज़माने की तुम्हे परवाह है
तुम उसके डर से सच्ची महोब्बत को स्वीकारने से घबराती हो.....
पर तुम भी याद रखना
जिस रूह के हम साथी हैं
उसमे तुम्हारा अक्स खुद समाएगा
तुम्हे अपना बनाए बिना
ये आशिक कहीं नही जाएगा.............
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