मुकाम को मंज़िलें क्या मिली

चंद ख्वाहिशे क्या सीलि
जीने के नज़रिए ही बदल गए,
मुकाम को मंज़िलें क्या मिली
रुके कदम अपने आप चल गए ,
गुज़रते रास्तों पर कुछ अंजाने अपने से लगे
मौसम भी हमारे साथ हासणे लगे,
ज़िंदगी का ये रूप मन को बहुत भाया
ना जाने वो कौन सी शक्ति है
जिसके रहते हमने ये नया जीवन है पाया
धन्यवाद

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