सब कुछ है इर्द गिर्द
कैसी वीरानी सी ज़िंदगी हो गई है
अपनों के बीच बैठा हूँ,
फिर भी एकेला रहता हूँ,
जैसे बिन घटा के सावन
बिना खुश्बू के गुलाब
सब कुछ है
इर्द गिर्द
फिर भी मुझे चाहिए वैराग .....
अपनों के बीच बैठा हूँ,
फिर भी एकेला रहता हूँ,
जैसे बिन घटा के सावन
बिना खुश्बू के गुलाब
सब कुछ है
इर्द गिर्द
फिर भी मुझे चाहिए वैराग .....
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