मैं फिर भी अकेला हूँ

मैं फिर भी अकेला हूँ

कलयुग में जी रहा हूँ
मीलों लंबे रास्ते नाप रहा हूँ
जो मिलता है
उसके दिल में झाँक रहा हूँ
मैं फिर भी अकेला हौं ...........

भीड़ का हिस्सा हूँ
कई ज़ुबानों का किस्सा हूँ
साथ है मेरे ......मेरे ही फ़ैसले ,
फिर भी जाने क्यों पिसता हूँ
मैं अकेला हूँ,

हिम्मत भी है
निडर भी हूँ ,
जहाँ जाना चाहूं
अगले पल उधर ही हूँ ,
वक़्त का भी साथ है
मैं फिर भी अकेला हूँ ,

रोज़ तूफ़ानो से टकराता हूँ
जैसे तैसे निकल जाता हूँ
अपना अनुभव सबको बतलाता हूँ
मैं फिर भी अकेला हूँ,

नित नई किर्णो का अहसास करता हूँ
जो है उसमे विश्वास रखता हूँ
ना जाने वो कौन सा बिंदु है
जिसकी बेड़ियों से मैं खेला हूँ...
जिसके अहसास के समक्ष
मैं आज भी खुद को पाता अकेला हूँ ....

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