मैं बन कबीरा

मैं बन कबीरा
उठना चाहता हूँ जग क बीड़ा
कहाँ से शुरू करूँ
कोई बतलादे बन गुरु ,
मैं साथ समुंदर के रहूं
सराहना चाहता हूँ हर खुश्बू
वक़्त को सलाम करता
फिर कदम रखूं
दिल में अनगिनत आरज़ू लिए
संग सबके चलूं ,
चाहता हूँ कुछ ऐसा बनाना ये जहाँ
की मुस्काराकर मेरा खुदा कहे
तू मुझमें नही
मैं तुझमें बासू.................

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