वक़्त ने ज़ख़्मों के साथ मल्हम भी भेजी थी

वक़्त ने ज़ख़्मों के साथ मल्हम भी भेजी थी
वो तो हम ही ख़ुदग़र्ज़ निकले
जो उसे अपना हक़ समझ बैठे,
वक़्त का क्या है कसूर
वो तो खुद ,हमारे कर्मों के आगे है मजबूर,
फिर भी हमसे पियार करता
हर दिन नई रोशनी से हमे भरता ,
और एक हम हैं की
उसकी मल्हम को अपना हक़ जान
ज़माने को कहते 
वक़्त ने मुझे पहचान लिया
अब तू भी पहचान ..................

Comments

Popular posts from this blog