वाह रे ए वक़्त

अजीब अजीब से पहलुओं से कई बार
कुछ इस तरह सामना हो जाता है
चलते चलते रास्तों पर
होसला डगमगा जाता है,
जिस सोच से कभी नही
घबराएँ हों,
जिस सोच से कभी नही
घबराएँ हों...........
उस के आगे सिर ,
झुकाया जाता है
मजबूरन
ज़ुबा तो स्वीकार कर लेती है
पर ये मन
उसे स्वीकार नहीं कर पाता है

वाह रे ए वक़्त
तू भी किस किस तरह
पलट कर आता है.........
पल में ज़िंदगी को तमाशा दिखा जाता है..........

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