रोज़ सपनों को धागों से सीती हूँ

रोज़ सपनों को धागों से सीती हूँ
एक पूरा होते ही दूसरे पर
आस लगाए जीती हूँ,

आज सोचती हूँ
तो लगता है

बड़ा ही अजीब है ये
इच्छाओं का सिलसिला
एक से दूसरे में कब बदल जाता है
पता नही
और भूल जाते उसे
जो है मिला..........

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