समझो तो है ,रिश्तों में जान

समझो तो है ,रिश्तों में जान 
सिर पर हो जैसे आसमान,
माना की कई बार निभाना , नही होता आसान
मगर जो निभाता है रिश्तों को , वही बना पाता है अपनी पहचान,
क्योंकि जो खुद को ही नही जान पाया 
उसे दुनिया क्या जानेगी
जो किसी के लिए , सिर झुका नही पाया,
उसे एकेले देख भी , क्या पहचानेगी
क्योंकि सागर की बूँद हम तभी कहलाएँगे
जब उसके रंग में मिल ............. उसको हर उफान से बचाएंगे
हर हाल में साथ निभाएँगे
यदि उड़ कर किनारे पर पड़े रहे
तो,
कुछ ही पल में सूख, कर बेवजूद, मिट जाएँगे....

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