उन लम्हों को समेट कर निकल पड़ा

उन लम्हों को समेट कर निकल पड़ा
जिनमें अब तक था जकड़ा हुआ
मेरी सोच कहीं अटक गई थी
राह भटक गई थी,
अपने ही घर की दीवारें मुझे
गैर बतलने लगी थी,,
पर जैसे ही उलझनों के भवर को तोड़ा
ज़िंदगी फिर नई थी,

आज यकीन हो गया
ज़िंदगी हमारा साथ कभी नही छोड़ती


ये तो केवल हमारी सोच है जो हमे तोड़ती.......

Comments

Popular posts from this blog