मन भ्रमण

मन भ्रमण

बैठा बैठा पत्थर पर खरोचें मारता
ज़माने का गुस्सा उस पर उतारता,
खुद को आज बेबस महसूस करता हूँ
पत्थर की तरह बेज़ुबान सही
पर पत्थर नही बन सकता हूँ,
क्योंकि मैं सच बोलता हूँ
जो ज़माने को मंज़ूर नही
झूठी ज़िंदगी जीने की शायद उनकी आदत सी बन गई है,
दम घुटने लगा है अब
बनावटी सा लगने लगा सब,
उनके साथ मेल रखता हूँ
तो खुद के असूलों से गिरता हूँ,
और जब भी मन भ्रमण कर, मन की सुनता हूँ
तो भीड़ में भी मस्त सपने बुनता हूँ,
अब लगता है
कि मैं अपने खुवाबो के साथ बेवफ़ाई नही कर पाउँगा
मैं चाहूँ भी तो इन लोगो के साथ निभा नही पाउँगा,
उनके तो घरों के शीशे भी एहेंकारी  से लगते हैं

मुझे तो ये लोग वास्तव में, बिखारी  लगते हैं|

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