जाने मन क्या कहता है
किस गुफ्तगू मे रहता है,
मेरा साथ देने की बजाए
संग आसुओं के बहता है,
मैं सोचती थी की वो मेरी कमज़ोरी है
पर क्या जानती थी,
मुझ तक पहॉंच ने पहले
वो मेरे दर्द को सहता है………..
बिन कहे भी ये मान बहोत कुछ कहता है….
खुद पर ना कर इतना गुमान कि खुदा की रहमतो को भाँप ना सके, मौत सबको मिटी मे हे मिलती है क्या सोचता है तू खुले आकाश के तले, यदि फर्क सिर्फ़ अमीरी ग़रीबी का है तो ये बस पैसे का कमाल है, खुदा ने तो हम सबको एक जैसा हे बनाया है उपर मिलकर पूछूँगा तुझसे बोल……. अब तेरा क्या ख़याल है………. धन्यवाद सोनाली सिंघल
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