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Sirf Anubhav

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तुम जब भी हमें नीचा दिखाने की कोशिश करते हो ना सच कहें हमे बुरा नहीं लगता क्योंकि हम तो अब खुद को दफना कर तुम्हारे साथ रहते है  बल्कि विचार करने की बात ये है कि  तुम्हें कभी ताजुब नहीं हुआ  हम ये सब कैसे सहते हैं                                                                                    बिन सोचे ज़िन्दगी कई बार कुछ यूँ उलझ जाती है कि ठीक ठाक दिखने वाले रास्ते पे चलने पर भी हवाएं हमें कंकर पत्थर वाले रास्तों पर मोड ले जाती है आंखों देखी नजर अंदाज़ करना पड़ता है  और जिस पर मन नहीं ठुक ता  उस पर भी विश्वास करना पड़ता है                                                            ...

Ehsaas

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स्वीकार नहीं कर पा  रही जो भूलना बहुत जरूरी हो गया है। वो भूल नहीं पा रही                                                                          हिसाब तो लगता है  ज़िन्दगी में किसी भी चीज का  कभी हुआ ही नहीं है  कहीं जरूरत से ज़्यादा है  तो कहीं जरूरत का भी नहीं है।                                                                                               परवाह करनी छोड़ ही दो तुम हमारी  जब जब तुम हमारा हाथ थाम कर  हमें किनारा दिखाते है  उसके साथ दलीलों को गिनवाते  हो   ...

MERA ANUBHAV

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कमाल है ना  जनम जनम के साथी हम फिर भी अक्सर एक दूसरे का समझ नहीं पाते मन  यही है जिन्दगी कभी ज्यादा तो कभी कम  कभी व्यर्थ तो कभी सम कभी खुशी तो कभी गम  कभी मुस्कान तो कभी आंखें नम                                                                             हा ये सच है जो मुझे मिला है  वो बहुतों को भी नहीं मिलता पर क्या करू  आज कल इस दिलासे से भी मेरे दर्द नहीं सिलता                                                                                             समझ नहीं आ रहा  घर से निकलना है  या घुलते हुए ज़हर को निग...

मेरा अनुभव

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भगवान की रचाई हर चीज का हम अनादर करने लगे थे  चाहे वो प्राकृति हो या इंसा अब ऐसा सबक मिला है खुद को जिंदा रखने के लिए रोज़ लड़ रहा है इंसा छोड़ कर तू गया है  मैं नहीं  याद रखना तू वजूद लेकर जा सकता है एहसास नहीं या तो तुम बदल गए  या मैं बदल गई  कुछ तो पलटी खाई है किस्मत ने  तुम्हारा पता नहीं मैं तो ढल गई

CORONA EXPERIENCE

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एक फितूर था  जो मेरे पास है सब मेरा है लॉकडाउन ने समझा दिया  जाग जाओ अब सवेरा है                                                                                    हैरान है परेशान है  कमाल की बात ये है की।  अभी भी खुद के कर्मो से अनजान है  अब तो वक़्त ने भी कर दिया है ऐलान  फिर भी नासमझ बन घूम रहा है इंसान                                                                                                                           ...

MERA ANUBHAV

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तुम मेरे साथ हो कृष्णा कुछ ख्वाब अभी भी हैं अधूरे कुछ हो गए पूरे साथ था कभी अपनों का कभी था सपनों का कभी गिरे तो कभी उभरे हाथ थामे बैठा है वो शायद इसलिए परिस्थिति कैसी भी अभी तक नहीं गुज़रे खुश भी हूं खफा भी हूं खुद से कभी कभी जुदा भी हूं मैं खामोशी भी हू सज़ा भी हूं मैं मुस्कुराती हुई शाम की महकती हुई हवा भी हूं मैं क्या हूं मैं सुएम् भी उस सवाल से अभी तक घिरा नहीं हां में वो ज़रूर हूं जिसका कोई सिरा नहीं मैं वो अंगूठी हूं जो अंगुली में तो है पर उसमें कोई हीरा नहीं मैं भुजे दीपक का धुआं हूं मोहब्बत से भरा कुआं हूं आज़माना मत मैं कोई खिलौना नहीं हूं मन मरजी से बिछने वाला कोई बिछौना नहीं हूं                                                                       कश्ती सच्ची म...

हाँ बस लड़ रहा है

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आज के दौर में गौर फरमाओ तो आदमी बस लड़ रहा है  कोई खुवाँबों से कोई शरीर से  कोई हालात से तो कोई जज़्बात से कोई मजहबों से कोई फुटपाथ से  कोई अपनों से  तो कोई समाज से  बस लड़ रहा इस कायनात से बस अब थक गया मैं ग़लतियाँ समझ गया मैं माफ़ कर दे ए खुदा अब ना करूँगा कोई ख़ाता फिर चाहे सबका करूँगा सम्मान प्रकृति हो या जानवर या हो इंसान                                                                  मैं अब सिर्फ विवेक के रास्ते पर चलना चाहता हूं बहुत ठोकर कहा चुका हुं बस अब और नहीं इस बनावटी दुनिया के  बिछाए जाल में खुद को छलना चाहता हूं